Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Monday, 20 February 1978

કહ્યું નાં કોઈને

પાલખી ઉઠાવી
પ્રિયા ની
એક ' દિ ચાલ્યો ;

કહ્યું નાં કોઈને
પ્રિયતમ ,
મન તણી મૈયત ઉઠાવી .
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Original  Gujarati  /  20  Feb  1978

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Hindi Translation  /   04  August  2015

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कहे भी तो किसको  ?

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ज़माना क्या जाने  ?

ज़माना तो ये माने
पालखी उठा के चला प्रीतम ,

प्रिया जाने ,
प्रीतम के पैर क्यों लड़खड़ाये  !

पालखी ना ,
चला इश्क आज
मन की मैयत उठाये  !

कहे भी तो किसको  ?

बैठी जो पालखी में प्रिया
न देख पाये
न आंसू रोक पाये ,

कहे भी तो किसको  ?

ज़माना क्या  समजे
मधु - रजनी नहीं ,
बिरह की
कभी ना ख़त्म होने वाली
रात को  !


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